Pandit Jawahar Lal Nehru

नवयुग के इंद्रजाल में दो किस्से बड़े फेमस हैं। पहला तो ये की हेडगेवार, नेहरू जी के कच्छे धुलवाने के लिए पेरिस लेकर जाते थे। उन्हें आने जाने का खर्च,और 2 आने की मजदूरी मिलती थी। जो एकबार न मिली, तो उन्होंने चीख चीख कर देश को सारी स्कीम बता दी। और दूसरा किस्सा यह कि नेहरू की सिगरेट हवाई जहाज से आती थी। तो नेहरू की सिगरेट पर खुलासा करेंगे। तो साहेबान, किस्सा ए हातिमताई में आज मुद्दा है- पाटस्कर, सिगरेट, नेहरू और हवाई जहाज। ●● एक थे पाटस्कर !!! पाटस्कर साहब मराठी थे, सुशिक्षित थे, वकील थे, कांग्रेस के बड़े नेता थे। सम्विधान सभा के सदस्य रहे और साफ, स्पस्ट बोलने के लिए जाने जाते थे। और फिर बाद में यही हरि विनायक पाटस्कर मध्यप्रदेश के राज्यपाल रहे। दरअसल, मध्यप्रदेश के सबसे लंबे कार्यकाल वाले राज्यपाल यही रहे हैं। ●● और लुंजपुंज टाइप मोहरा कैटगरी के राज्यपाल नही। गरिमामई, जब जरूरी न हो, राजकाज से दूर रहते। और जरूरी हो, तो दखल भी देते। राजभवनों की गरिमा कैसे मेंटेन हो, तापस्कर इसका प्रिसिडेंस सेट करने वाले पहले गवर्नर्स में से थे। जैसे- एक दफे मुख्यमंत्री भगवतचरण मंडलोई ने लैंड रेवेन्यू पर एक ऑर्डिनेंस निकाला। गवर्नर उसके कुछ प्रावधानों पर अड़ गए। दस्तखत से इनकार किया, और केंद्र को रिफर कर दिया। और फिर खुद केंद्र सरकार और कैबीनेट के सामने, अपने ओब्जेक्शन जस्टिफाई किये। उनकी बातें तार्किक थी। ऑर्डिनेंस में बदलाव किया गया। ●● डरने वाले जीव नही थे पाटस्कर। नेहरू को डपटने से भी परहेज नही किया। एक दफे नेहरू आये भोपाल। भोपाल की रानी ने, भोपाल पैलेस में उनके रुकने का आग्रह किया। नेहरू मान भी गए। खबर गवर्नर को लगी। फोन उठाया, और साफ कह दिया रानी को, नेहरू को भी.. महोदय, ये आपका सरकारी दौरा है। देश पीएम है, राजभवन में रुकेंगे। किसी राजा नवाब के महल में नही… नेहरू चुपचाप, गऊ की तरह मान लिए। ●● कैलाश नाथ काटजू सीएम थे। दंगे हुए जबलपुर में। नेहरू ने खुलकर मध्यप्रदेश सरकार के रोल, और सीएम की आलोचना की, सार्वजनिक झाड़ पिला दी। अब पाटस्कर ने फिर ओब्जेक्शन किया। वो कन्स्टिट्यूसन बनानें वालों में से थे। उन्हें पता था, कि यूनियन ऑफ इंडिया ऐसे नही चलता। चिट्ठी लिखी नेहरू को- महोदय। कानून और व्यवस्था राज्य के विषय हैं। केंद्र, या प्रधानमंत्री इस तरह से अपनी कटुक्तियाँ पास नही कर सकता। राज्य के मसलों पर केंद्र की सरकार सार्वजनिक आलोचना न करे। तो भईया, हद में रहो। तो अपने मुख्यमंत्री के सम्मान की रक्षा के लिए, प्रधानमंत्री से लड़ बैठने वाली शै थे तापस्कर साहब। आज पीएम, अपने मुख्यमंत्रियों को सरेआम चोर कहता है, फिर अगली सुबह उसी चोर के साथ सरकार बनवा लेता है। ●● जाहिर है, ऐसे नेहरू से उनकी नही बनती होगी?? और दोनों एक दूसरे को खूब नापसन्द करते होंगे?? तो सुनिये। नेहरू का भोपाल विजिट था। खाने के बाद नेहरू तसल्ली से एक सिगरेट पीते थे, यह पाटस्कर को मालूम था। मेजबान का फर्ज है कि मेहमान का ख्याल रखे। पर 555 ब्रांड विदेशी था। आसानी से नही मिलता था। भोपाल में न मिला, इंदौर में पता किया गया। तब इंदौर, भोपाल से बड़ा शहर था, वहाँ सिगरेट मिल गयी। पाटस्कर ने उसे मंगाने स्टेट प्लेन भेजा। ●● तो जब तक प्राइमिनिस्टर और गवर्नर, खा पीकर राजभवन के लॉन में बैठे, 555 सिगरेट टेबल पर मौजूद थी। यह सिर्फ पाटस्कर को मालूम था, की वो डिब्बी अभी-अभी हवा के उड़कर आयी है। ●● नेहरू ने सिगरेट न तो मंगाई, और न उन्हें इसकी जरूरत थी। क्योकि आई वाज नेहरुज शैडो में के.एफ. रुस्तमजी लिखते है- “नेहरू के दौरों के समय, उनके साथ एक काला बैग चलता था। उस बैग में तमाम पर्सनल चीजों, नाइट रीडिंग के लिए किताब और एक डिब्बी 555 स्टेट एक्सप्रेस ब्रांड की सिगरेट रहा करती थी” ●● बहरहाल, ये किस्सा, संघी लैब में इस्टमैनकलर रंगीन करके, तमाम फोर्जरी जोड़ी गयी है। ठीक उसी तरह जैसे इलाहाबाद की मशहूर पेरिस लॉन्ड्री, जो आनंद भवन से 10 मिनट की दूरी पर है, उसे यूरोप का पेरिस बताकर, संघी कच्छे धुलवाने लेकर जाते थे। शाखा में बुद्धि गिरवी रखे परममूर्ख, नींद में भी नेहरू की सिगरेट, नेहरू का कच्छा देखने के आदी हैं। सबसे बड़ा वाला तो संसद में बैठकर, जागती आंखों से, नेहरू के डरावने सपने देखता है। ●● नेहरू की डिफेंस मेरा उद्देश्य नही, सच बताना अवश्य है। और सन्योग की बात ये कि आप सच के करीब खड़े होते है.. तो नेहरू के करीब खड़े होते है। झूठ से दूरी, संघियो से दूरी कायम कर देती है।पाटस्कर भी सच के साथ खड़े होते थे। उचित बातों के लिए प्रधानमंत्री के सामने अड़ जाने वाले पाटस्कर साहब को 1963 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया था। नमन!